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मोनोलॉरिन: इस प्राकृतिक रोगाणुरोधी का पूरक क्यों लें?

17 फरवरी 2020

डॉ. माइकेल मरे द्वारा

इस लेख में:


मोनोलॉरिन एक वसा है जो माँ के दूध में पाया जाता है जहाँ वह प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एंटीसेप्टिक की भूमिका निभाता प्रतीत होता है। यह नारियल के तेल में भी पाया जाता है और मानव शरीर में लॉरिक एसिड से भी बनाया जा सकता है, जोकि आम तौर पर नारियल के तेल में मौजूद वसा का लगभग 50% होता है।


मोनोलॉरिन, जिसे ग्लिसरिल मोनोलॉरेट या ग्लिसरिल लॉरेट के नाम से भी जाना जाता है एक आहार पूरक के रूप में भी उपलब्ध है। इसके संक्रमण रोधी गुण 50 से अधिक वर्षों से ज्ञात हैं, लेकिन हाल के दिनों में अनेकों अध्ययनों में इसके वायरसरोधी और जीवाणुरोधी प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है।

मोनोलॉरिन के प्राकृतिक रोगाणुरोधी प्रभाव

कई वायरसों, जीवाणुओं और प्रोटोज़ोआ परजीवियों के शरीर पर वसा पदार्थों (लिपिड) से बनी एक सुरक्षात्मक झिल्ली का आवरण होता है। वर्तमान अनुसंधान से पता चलता है कि मोनोलॉरिन जीवों के चारों ओर मौजूद वसीय आवरण के लिपिड को विच्छेदित करके इन रोगाणुओं को नष्ट करता है। दूसरे शब्दों में, मोनोलॉरिन मूल रूप से जीव के सुरक्षात्मक कवच को विघटित कर देता है जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए उसे नष्ट करना आसान हो जाता है। कोशिका कल्चर में किए गए अध्ययनों ने दर्शाया है कि मोनोलॉरिन इन जैसे लिपिड के आवरण वाले वायरसों को खत्म करता है:

  • साइटोमेगैलोवायरस
  • एपस्टीन-बार वायरस
  • हर्पीज़ सिम्प्लेक्स वायरस-1 और 2
  • ह्युमन लिम्फोट्रॉपिक वायरस (टाइप 1)
  • इनफ्लुएंज़ा वायरस
  • खसरे का वायरस
  • न्यूमोवायरस
  • सारकोमा वायरस
  • सिन्साइशियल वायरस
  • वेसिकुलार स्टोमेटाइटिस वायरस
  • विस्ना वायरस

हाल ही में फैले कोरोनावायरस के प्रकोप के साथ, यह दुर्भाग्य की बात है कि इस वायरस के विरुद्ध मोनोलॉरिन का मूल्यांकन नहीं किया गया है। कोरोनावायरस वायरसों का एक समूह हैं जो मनुष्यों समेत स्तनपायिओं में, और पक्षियों में रोग पैदा करते हैं। मनुष्यों में, यह वायरस श्वसन संबंधी संक्रमण पैदा करता है जो आम तौर पर सौम्य होते हैं, लेकिन, दुर्लभ मामलों में वे जानलेवा हो सकते हैं। हालांकि, कोरोनावायरस की संरचना में भी लिपिड का एक आवरण शामिल है जिससे इस बात की बहुत संभावना है कि वह भी मोनोलॉरिन की वायरसरोधी प्रक्रिया से प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा, एक और संभावी प्रक्रिया भी है जिसके द्वारा मोनोलॉरिन कोरोनावायरस को बाधित कर सकता है। कोरोनावायरस "लिपिड नौका" का निर्माण करता है जिसके द्वारा वायरस का लिपिड आवरण मनुष्यों के श्वसन मार्ग की भित्ति की कोशिकाओं के साथ अंतर्क्रिया करता है जिससे वायरस उससे संलग्न हो जाता है और फिर मानव कोशिका में प्रवेश करता है। लिपिड नौका में बदलाव से अन्य वायरसों पर होने वाले मोनोलॉरिन के विघटनात्मक प्रभाव की तरह ही यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है जिससे मोनोलॉरिन कोरोनावायरस को अवरुद्ध कर सकता है। दुर्भाग्य से, यद्यपि मोनोलॉरिन के साथ अन्य अध्ययनों के आधार पर उसके उपयोग का औचित्य है, कोरोनावायरस पर उसका अध्ययन नहीं किया गया है।


वसा आवरण के नष्ट करने की इसी प्रक्रिया से मोनोलॉरिन के द्वारा निष्क्रिय होने वाले रोगजनक जीवाणुओं में शामिल हैं, बोरीलिया बर्गडोरफेरी (लाइम रोग का कारण), लिस्टीरिया मोनोसाइटोजीनस, स्टैफाइलोकॉकल ऑरियस, स्ट्रेप्टोकॉकस प्रजाति, स्टैफाइलोकॉकल एपिडर्मिस, और हेलिकोबैक्टर पाइलोरी। एंटीबायोटिक औषधियों के विपरीत, मोनोलॉरिन न केवल इन जीवाणुओं को निष्क्रिय करता है, बल्कि यह भी प्रतीत होता है कि जीवाणु भी इसके विरुद्ध प्रतिरोध विकसित करने में असमर्थ रहते हैं। इसने मेथिसिलीन प्रतिरोधी स्टैफाइलोकॉकस ऑरियस (MRSA) के विरुद्ध भी गतिविधि दर्शाई हैI


हाल के अध्ययनों ने यह भी दर्शाया है कि मोनोलॉरिन एक और तरीके से कुछ जीवाणुओं को मारता है जिससे वह जीवाणुओं की उस क्षमता में हस्तक्षेप करता है जिससे वे उन कोशिकाओं के साथ अंतर्क्रिया करते हैं जिन्हें संक्रमित करने का वे प्रयास कर रहे होते हैं।


मोनोलॉरिन कई कवकों, खमीर और प्रोटोज़ोआ को भी मारता या निष्क्रिय करता है जिनमें कैंडिडा ऐल्बिकैंस, रिंगवर्म की कई प्रजातियाँ, और जियार्डिया लैम्बलिया शामिल हैं।

मोनोलॉरिन बायोफिल्म को रोकता और नष्ट करता है

बायोफिल्म उन जीवाणुओं या खमीर की एक चिकनी, चिपचिपी मैट्रिक्स है जो आपस में करीब से लिपटे होते हैं और छोटी आंत के अस्तर समेत सतहों से चिपके रहते हैं। सामान्यतः, बायोफिल्म की रचना करने वाले खमीर और जीवाणुओं से छुटकारा पाना अक्सर कठिन होता है। मूल रूप से, ये जीव तब बायोफिल्म का निर्माण करते हैं जब वे खतरे में होते हैं। यह एक उत्तरजीविता की प्रक्रिया है और उन मुख्य कारकों में से एक है जिनके कारण जीव किसी एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी बनता है। यह उनके द्वारा स्वयं को सुरक्षित करने के लिए एक अवरोध बनाने के समान है। यह उन कारणों में से एक है जिससे जब छोटी आँत में खमीर या जीवाणुओं की अतिवृद्धि होती है जैसा कि SIBO (small intestinal bacterial overgrowth) में होता है तब एंटीबायोटिक उस समस्या को हल करने में विफल रहते हैं। जीवाणु बायोफिल्म का निर्माण करते हैं और तब तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक कि पर्यावरण से एंटीबायोटिक साफ न हो जाएं और उनके दोबारा बढ़ने के लिए सुरक्षित न हो जाए। मोनोलॉरिन को बायोफिल्म मैट्रिक्स को विघटित करने में बहुत कारगर पाया गया है जिससे जीवाणु या खमीर प्राकृतिक कारकों के संपर्क में आ जाते हैं जो छोटी आंत को अपेक्षाकृत रोगाणु-मुक्त रखते हैं। 


आंतों में अतिवृद्धि करने वाले बायोफिल्म बनाने वाले जीवाणु और खमीर आम तौर से उल्लेखनीय गैस और पेट के फूलने से संबद्ध होते हैं। हालांकि कोई नैदानिक अध्ययन नहीं किए गए हैं, यदि मोनोलॉरिन का यह प्रभाव प्रायोगिक मॉडलों की तरह ही हमारे शरीर में भी कारगर है तो यह एक उल्लेखनीय सफलता होगी। 

मोनोलॉरिन कैंडिडा ऐल्बिकैंस के विरुद्ध उल्लेखनीय क्रिया करता है

कैंडिडा ऐल्बिकैंस मानव शरीर का सामान्य निवासी है। सामान्य तौर पर यह नियंत्रण में रहता है। 2018 में किए गए एक अध्ययन (Biol Pharm Bull. 2018;41:1299-1302) ने सी. ऐल्बिकैंस के एक कृत्रिम रूप से तैयार किए गए प्रकार जो सही रोशनी में फ्लोरेसेंस (चमक) प्रदर्शित करता है का उपयोग करके मूषकों में कैंडिडा ऐल्बिकैंस बायोफिल्मों के विरुद्ध मोनोलॉरिन की कवकरोधी गतिविधि को प्रदर्शित किया। मोनोलॉरिन की कवकरोधी गतिविधि का निर्धारण एक प्लेसिबो, मोनोलॉरिन, या एक कवकरोधी औषधि (नाइस्टैटिन) से उपचार किए गए मूषकों की तुलना करके किया गया। परिणामों ने दर्शाया कि मोनोलॉरिन के मौखिक स्थानिक उपचार लगभग उतने ही कारगर थे जितना कि नाइस्टैटिन थी और उन्होंने सी. ऐल्बिकैंस की बायोफिल्म का निर्माण करने की क्षमता पर उल्लेखनीय प्रभाव डाला। अध्ययन का निष्कर्ष कहता है कि “जीभ के नमूनों के प्रयोगशाला में किए गए समग्र सूक्ष्मजीववैज्ञानिक विश्लेषण ने एक शक्तिशाली कवकरोधी उपचारात्मक एजेंट के रूप में मोनोलॉरिन की प्रभावकारिता की पुष्टि की।”


मोनोलॉरिन के नैदानिक प्रभावों का मूल्यांकन सी. ऐल्बिकैंस या गार्डनेरेला वैजाइनैलिस नामक जीवाणु के कारण होने वाले योनिसंबंधी संक्रमणों वाली महिलाओं में किया गया (Antimicrob Agents Chemother. 2010;54:597-601). इन जीवों के कारण होने वाले योनिसंबंधी संक्रमण काफी आम हैं और उनमें से कई दीर्घकालिक या पुनरावर्ती हो जाते हैं। चूंकि मोनोलॉरिन दोनों जीवों के विरुद्ध गतिविधि उत्पन्न करता है, योनि संबंधी सूक्ष्मजीवों पर मोनोलॉरिन के प्रभावों की जाँच करने के लिए एक यादृच्छिकृत, दोहरे-अज्ञात अध्ययन की परिकल्पना की गई। महिलाओं ने 2 दिनों तक हर 12 घंटे पर 0%, 0.5%, या 5% मोनोलॉरिन से युक्त जेल को योनि के अंदर लगाया। पहली बार जेल को लगाने के पहले और तत्काल बाद तथा अंतिम बार जेल लगाने के 12 घंटे बाद योनि से नमूने एकत्र किए गए। इन नमूनों को लैक्टोबैसिलस, कैंडिडा, जी. वैजाइनैलिस के लिए जाँचा गया। मोनोलॉरिन ने न केवल योनि की अम्लीयता को प्रभावित नहीं किया, बल्कि योनि में लैक्टोबैसिलस की मात्रा को प्रभावित किए बिना कैंडिडा और जी. वैजाइनैलिस को भी उल्लेखनीय रूप से कम किया।


उपरोक्त दो अध्ययन कई कारणों से उल्लेखनीय हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मोनोलॉरिन द्वारा कोशिका और टेस्ट-ट्यूब के अध्ययनों में उत्पन्न रोगाणुरोधी प्रभाव पशुओं और मनुष्यों के अध्ययनों में भी देखे गए हैं। यदि यह बात उन सभी सूक्ष्मजीवों, खास तौर पर वायरसों के लिए सत्य है जिनके विरुद्ध मोनोलॉरिन गतिविधि दर्शाता है, तो मोनोलॉरिन को एक उल्लेखनीय चिकित्सीय प्रगति माना जा सकता है।

मोनोलॉरिन की अनुशंसित खुराक: 

आम तौर पर मोनोलॉरिन को आहार पूरक के रूप में आरंभ में एक सप्ताह के लिए 750 मिग्रा प्रतिदिन दो या तीन बार की खुराक में लिया जा सकता है, फिर खुराक को एक और सप्ताह के लिए 1,500 मिग्रा दो या तीन बार प्रतिदिन तक बढ़ाया जा सकता है। जरूरत हो तो, खुराक को 3,000 मिग्रा दो या तीन बार प्रतिदिन तक बढ़ाया जा सकता है। आम तौर जब कोई स्पष्ट जरूरत नहीं होती है तो उपयोग बंद कर दिया जाता है।

क्या मोनोलॉरिन सुरक्षित है?

मोनोलॉरिन को अमेरिकी खाद्य और औषधि प्रशासन (FDA) ने सामान्य तौर पर सुरक्षित (GRAS) माना है। वास्तव में इसका उपयोग एक प्राकृतिक रोगाणुरोधी के रूप में पशुओं के फीड में अपेक्षाकृत अधिक खुराक में किया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि, यह जठरांत्र के स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने वाले महत्वपूर्ण जीवाणुओं पर अपना रोगाणुरोधी प्रभाव नहीं डालता है। हालांकि यह बहुत सुरक्षित नज़र आता है, फिर भी सुरक्षा डेटा के अभाव के कारण मोनोलॉरिन का उपयोग गर्भावस्था और बच्चे को दूध पिलाने के दौरान करने से बचना चाहिए।

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