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यकृत के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के 7 प्राकृतिक तरीके

23 सितंबर 2019

पैट्रीशिया एल जेरबार्ग, एमडी और रिचर्ड पी ब्राउन, एमडी द्वारा

इस लेख में:

 

यकृत एक अत्यावश्यक अवयव है, जो हमारे शरीर में प्रवेश करने वाली हर चीज—खाद्य पदार्थ, दवाइयों, अल्कोहल, और विषैले तत्वों के चयापचय और निराविषीकरण के लिए आवश्यक है। यह भारी काम करता है। यकृत की कोशिकाएं कई प्रकार के एंज़ाइमोंका उत्पादन करती हैं, जो पोषक तत्वों (उदा. आहार के वसा और प्रोटीन) और संभावित विषैले तत्वों को विघटित करने के साथ-साथ हमारी कोशिकाओं के लिए ऊर्जा का उत्पादन करने और प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट या वसाओं जैसे सैकड़ों जरूरी यौगिकों का निर्माण करने में सक्षम होते हैं। यकृत शर्करा और विटामिनों को भंडारित करता है और आवश्यकतानुसार उन्हें मुक्त करता है। यकृत को क्षति के गंभीर स्वास्थ्य संबंधी परिणाम हो सकते हैं। सौभाग्य से, यकृत की कोशिकाएं, हेपेटोसाइट्स आंतरिक मरम्मत प्रणालियों से युक्त होती हैं जो फ्री रैडिकल्स से लगातार लड़ती हैं और क्षतिग्रस्त कोशिका-घटकों का पुनर्निर्माण करती हैं। तथापि, जब इन स्व-संरक्षक प्रणालियों को अत्यधिक खतरे का सामना करना पड़ता है, तब क्षति हो सकती है।

हेपेटाइटिस (यकृत का शोथ) और सिर्रोसिस (यकृत में क्षत होना) संक्रमणों (उदा., हेपेटाइटिस), विकिरण, अल्कोहल और अन्य विषैले तत्वों (उदा., कीटनाशक, भारी धातुएं, जहर), पित्ताशय की पथरी (कोलीस्टैसिस), खराब आहार, नुस्खे की दवाइयों, या कैंसर के कारण हो सकते हैं

गैर-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग (NAFLD) अमेरिका में लगभग 30% आबादी को प्रभावित करता है और मोटापे, टाइप 2 डायबिटीज़, हाइपरलिपिडीमिया, और इंसुलिन प्रतिरोध से संबद्ध है। NAFLD से ग्रस्त कुछ लोगों में शोथ (स्टीटोसिस) विकसित होता है जो आगे बढ़कर सिर्रोसिस में बदल सकता है।

हेपेटाइटिस के होने पर यकृत के एंज़ाइमों के स्तर बढ़ जाते हैं जिन्हें सामान्य रक्त जांचों में पहचाना जा सकता है। आम तौर पर, जब परेशान करने वाले पदार्थ को बंद कर दिया जाता है, तो यकृत के एंज़ाइम फिर से सामान्य हो जाते हैं। तथापि, जब वे सामान्य नहीं होते हैं, तो पूरक लेने की आवश्यकता हो सकती है क्योंकि पारंपरिक चिकित्सकीय उपचार काफी सीमित है। कभी-कभी यकृत के एंज़ाइमों के बढ़ जाने पर भी परेशान करने वाली दवाई को जारी रखना पड़ सकता है। यकृत की सामान्य गतिविधि को बहाल करने के लिए पूरकों का उपयोग किया जा सकता है, जैसे सुरक्षात्मक एंटीऑक्सिडैंट आपूर्ति को बढ़ाकर, ताकि व्यक्ति अपनी आवश्यक दवाई लेना जारी रखने में सक्षम हो सके।

जब यकृत स्वयं की मरम्मत करने के लिए संघर्ष करता है, तब क्षत ऊतक बनता है और यकृत की गतिविधि को क्षीण करता है (सिर्रोसिस)। यदि सिर्रोसिस अनियंत्रित रह जाती है, तो इससे जीवन को खतरा हो सकता है। यकृत की सिर्रोसिस के सबसे आम कारण हैं हेपेटाइटिस सी वायरस, अल्कोहल से संबंधित यकृत रोग, गैर-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग, और हेपेटाइटिस बी।

बेहतर तरीके से काम करने, जख्मों से लड़ने, और क्षति से उबरने में यकृत की मदद करने के लिए, निम्नलिखित पूरक काफी मददगार साबित हो सकते हैं: एस-एडीनोसिल मेथियोनीन (SAM-e), बीटेन, पॉलीइनॉलफॉस्फोटिडिल कोलीन, शिसांड्रा, बुप्ल्यूरम, रोडियोला, मिल्क थिसल, कर्क्युमिन, और चीनी हर्बल फार्मूले।

यकृत के रोगों के लिए पूरकों पर शोध का मूल्यांकन करना

मनुष्यों में नैदानिक अध्ययनों को अनुमोदित करने से पहले पशु और ऊतक शोध आवश्यक होता है। तथापि, हमें कृंतकों में सकारात्मक प्रभावों से मनुष्यों में संभावित प्रभावों के बारे में सावधान रहना होगा, खास तौर पर यकृत के अध्ययनों में, क्योंकि कृंतकों के यकृत और मनुष्यों के यकृत के बीच जैविक अंतर हैं। 

1. एस-एडीनोसिलमेथेयोनीन (SAM-e)

SAM-eशरीर की कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक पूर्णतया प्राकृतिक मेटाबोलाइट है जो 100 से अधिक जैवरासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है। चूंकि SAM-e एक अत्यंत परस्पर क्रियाशील अणु है, हवा के संपर्क में आने पर वह तेजी से ऑक्सीकृत होता है। पूर्ण क्षमता सुनिश्चित करने के लिए उपभोक्ताओं को केवल सर्वोच्च गुणवत्ता के SAM-e उत्पाद ही खरीदने चाहिए।

असंख्य अध्ययनों ने दर्शाया है कि SAM-e यकृत की गतिविधि को सुधारता है और अल्कोहल, औषधियों, विषैले तत्वों, संक्रमणों, या पित्ताशय की पथरी (गर्भावस्था के दौरान होने वाली सहित) के कारण होने वाले सिर्रोसिस या हेपेटाइटिस वाले रोगियों में असामान्य यकृत गतिविधि जाँचों को सामान्य करता है। SAMe ग्लूटाथायोन, एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडैंट जो फ्री रैडिकल हमलों को प्रभावहीन करता है, को बनाने के लिए आवश्यक है। SAMe दवाइयों (उदा., आक्षेपरोधी, अवसादरोधी, और मनोदशा को स्थिर करने वाली) के कारण उत्पन्न असामान्य यकृत गतिविधि का निवारण या उसे निष्प्रभावी भी कर सकता है। अल्कोहल से उत्पन्न यकृत सिर्रोसिस, चाइल्ड्स वर्ग ए और बी मामलों के एक 20-वर्षीय अध्ययन में, SAM-e 1,200 मिग्रा/दिन ने उत्तरजीविता को बढ़ाया और यकृत प्रतिरोपण को विलम्बित किया। 

SAM-e के यकृत की सुरक्षा करने वाले प्रभावों को बढ़ाना

जब यकृत अधिक क्षतिग्रस्त होता है, जैसा कि यकृत गतिविधि जाँचों के सामान्य स्तर से तीन गुना से अधिक होने से पता चलता है, SAM-e के लाभों को बढ़ाने के लिए कतिपय पूरकों का उपयोग किया जा सकता है। 

बीटेन (ट्राईमिथाइलग्लाइसीन) की व्युत्पत्ति अमीनो अम्ल, ग्लइसीन से होती है। बीटेन के आहार स्रोत हैं, आहार में सेवन और यकृत द्वारा संश्लेषण। कृंतकों के अध्ययन दर्शाते हैं कि बीटेन यकृत की क्षति को रोक या निष्प्रभावी कर सकता है। बीटेन ग्लूटोथायोन सुरक्षा को और बढ़ा कर और यकृत की वसाओं को विघटित करने की क्षमता को सुधार कर SAM-e के प्रभावों को बढ़ा सकता है। क्योंकि कृंतकों में मनुष्यों के मुकाबले यकृत चयापचय में अंतर होते हैं, बीटेन के दीर्घावधि उपचार के नैदानिक अध्ययनों की जरूरत है ताकि गैर-फैटी लीवर रोग (NFLD) और अल्कोहल से संबंधित यकृत रोग के प्रबंधन में उसका संभावित महत्व दर्शाया जा सके।

पॉलीइनॉलफॉस्फेटिडिलकोलीन यकृत के SAM-e भंडारों को बढ़ाता है, जिससे यकृत की बहाली का समर्थन करने के लिए SAM-e आपूर्तियों को बनाए रखने में मदद मिल सके। 

बी विटामिन SAM-e चयापचय में आवश्यक कोफैक्टर हैं। जब SAM-e का उपयोग अधिक तेजी से किया जा रहा होता है, तब SAM-e के स्तरों को कायम रखने के लिए अतिरिक्त बी-विटामिनों की भी जरूरत पड़ती है।

2. अल्फा-लिपोइक एसिड (ALA)

अल्फा-लिपोइक एसिड (ALA) को कृंतक यकृत अध्ययनों में एंटीऑक्सिडैंट्स को बढ़ाते और लिपिड प्रोफाइल में सुधार करते दर्शाया गया है। हालांकि ALA अनुपूरण से मानव परीक्षणों में सीरम इंसुलिन प्रतिरोध और प्रतिरक्षा अनुक्रिया नियामक स्तरों में सुधार हुआ है, अब तक, इसे गैर-अल्कोहलिक फैटी  लीवर रोग (NAFLD) वाले रोगियों में सीरम यकृत एंज़ाइमों और  यकृत में अत्यधिक वसा संग्रहणों (स्टीटोसिस) में सुधार करते दर्शाया नहीं गया है। 

3. बुप्ल्यूरम कैओई

बुप्ल्यूरम कैओईयकृत को सुरक्षित रखने वाले निम्नलिखित प्रभावों से युक्त है: शोथरोधी, फाइब्रोसिस-रोधी, ग्लूटाथायोन के उत्पादन में वृद्धि और यकृत कोशिका पुनरुत्पत्ति। बुप्ल्यूरम से युक्त चीनी हर्बल यौगिक यकृत के स्वास्थ्य का समर्थन करने में मदद कर सकते हैं। ताइवान में निर्मित पूरकों के संदूषकों से युक्त होने की कम संभावना है। 

4. मिल्क थिसल (Silybum marianum)

मिल्क थिसल लंबे समय से औषधि के रूप में उपयोग किया जा रहा है। कृंतकों में अध्ययनों के परिणामों ने इसकी आशाजनक क्रियाएं दर्शाई हैं, जिनमें शोथरोधी, प्रतिरक्षा-विनियामक, फाइब्रोसिस-रोधी, एंटीऑक्सीडैंट, और यकृत की मरम्मत करने वाले गुण शामिल हैं। पशुओं में, सिलीमैरिन, जो मिल्क थिसल में पाया जाने वाला सक्रिय संकर है, ने अल्कोहल, एसिटामिनोफेन, अत्यधिक आयरन, विकिरण, और अन्य विषैले तत्वों से क्षति को कम किया। मिल्क थिसल को यकृत गतिविधि जाँचों में बहुत हल्की बढ़तों के लिए या यकृत को सुरक्षित रखने वाले अन्य पूरकों के साथ संयोजन में आजमाया जा सकता है। यकृत के रोगों में लाभ स्थापित करने के लिए अधिक नैदानिक परीक्षणों की जरूरत है। 

5. शिज़ांड्रा (शिज़ांड्रा चिनेन्सिस)

पूर्वनैदानिक (कोशिकीय और पशु) अध्ययन दर्शाते हैं कि शिज़ांड्रा के सार संश्लेषित रासायनिक (जीनोबायोटिक) चोट से  यकृत की रक्षा करते हैं। इन सारों की सुरक्षात्मक प्रक्रिया में यकृत एंज़ाइम गतिविधि, ऑक्सीकरण व शोथ के प्रतिरोध और  यकृत की पुनरुत्पत्ति का तेज होना शामिल है। नैदानिक अध्ययनों ने दर्शाया है कि शिज़ांड्रा से व्युत्पन्न औषधियाँ सीरम में औषधि से प्रेरित यकृत एंज़ाइम स्तरों की वृद्धि को रोकती हैं।  शिसांड्रा के फलों (शिसांड्रा चिनेन्सिस या शिसांड्रा स्फेनांथेरा) या शिसैंड्रिन सी के संश्लेषित अनुरूपों पर आधारित औषधियों को चीन में यकृत की औषधि से प्रेरित चोट का उपचार करने के लिए आम तौर पर अनुशंसित किया जाता है। कृंतकों में किए गए एक अध्ययन में शिज़ांड्रा सार ने यकृत की कोशिकाओं (हेपेटोसाइट्स) में अल्कोहल से प्रेरित क्षति से उत्पन्न अत्यधिक वसा जमाव का निवारण और उसे निष्प्रभावी किया। 

6. रोडियोला 

देखा गया है कि रोडियोला की 20 से अधिक उपप्रजातियाँ बहुत ठंडी जलवायु में, खास तौर पर अधिक ऊँचाई वाले स्थानों में उगती हैं। इनमें से कुछ का एडाप्टोजेन्स के रूप में गहन अध्ययन किया गया है, जो कई प्रकार के उपचारात्मक प्रभावों वाले कई जैवसक्रिय यौगिकों से युक्त जड़ी-बूटियाँ होती हैं। जिन जड़ी-बूटियों को यकृत के लिए सुरक्षात्मक गुणों से युक्त दर्शाया गया है, उनमें से कुछ की ही जाँच मनुष्यों में की गई है। आज बाज़ार में उपलब्ध रोडियोला की अधिकांश मात्रा बड़े पैमाने पर की गई खेती से आती है।

रोडियोला रोज़िया (गोल्डेन रूट, आर्कटिक रूट)

पशु और मानव अध्ययनों से हासिल चालीस से अधिक वर्षों के शोध के साक्ष्य रोडियोला रोज़िया के स्वास्थ्य-लाभों का समर्थन करते हैं। कई पशु और यकृत ऊतक अध्ययनों ने दर्शाया है कि रोडियोला रोज़िया की जड़ों के सार शक्तिशाली एंटीऑक्सिडैंट, शोथरोधी, तनाव-रोधी, और विष-रोधी प्रभावों से युक्त हैं जिनमें दवाइयों के विषैले प्रभावों से सुरक्षा शामिल है। 

रोडियोला इम्ब्रिकैटा और रोडियोला सैकालिनेन्सिस

कृंतकों पर किए गए अध्ययन संकेत देते हैं कि रोडियोला इम्ब्रिकैटा, एक प्रजाति जो हिमालय पर्वतों में उगती है, यकृत को सुरक्षित करने वाले प्रभावों से युक्त है। रोडियोला सैकालिनेन्सिस ने एक यकृत कोशिका अध्ययन में टैक्रीन कोशिका-विषाक्तता से सुरक्षा प्रदान की। यह निर्धारित करने के लिए कि क्या ये उपप्रजातियाँ मनुष्यों में कारगर हो सकती हैं, अधिक पशु और नैदानिक अध्ययनों की जरूरत है।

7. हल्दी (करक्युमा लॉंगा) से प्राप्त कर्क्युमिन

कर्क्युमिन, जो एक प्राचीन औषधि है, हल्दी का सार है। अध्ययन दर्शाते हैं कि यह शोथरोधी, फाइब्रोसिस-रोधी, और कैंसर-रोधी प्रभावों से युक्त है। इस पर अनुसंधान की मात्रा कम है क्योंकि मुंह से लेने पर कर्क्युमिन के उत्पादों की जैवउपलब्धता सीमित रहती है, यानी यह शरीर में अच्छी तरह से अवशोषित नहीं होता है। 

शोध अध्ययनों में बेहतर जैवउपलब्धता और कारगरता से युक्त नए उत्पादों का उपयोग किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, एक यादृच्छिकृत दोहरे-अज्ञात प्लेसिबो-नियंत्रित परीक्षण में, गैर-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग (NAFLD) वाले रोगियों को एक एमॉर्फस डिस्पर्शन कर्क्युमिन फॉर्मुलेशन (500 मिग्रा/दिन, 70 मिग्रा कर्क्युमिन के समतुल्य) या मेल खाता हुआ प्लेसिबो दिया गया। करक्युमिन का संबंध यकृत में वसा की मात्रा में 78.9% कमी से पाया गया जबकि प्लेसिबो समूह में केवल 27.5% सुधार हुआ। कर्क्युमिन पाने वाले लोगों में बॉडी मास इंडेक्स और कुल कोलेस्ट्रॉल, लो-डेंसिटी लाइपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स, और यकृत एंज़ाइमों (ऐस्पार्टेट अमाइनोट्रांसफरेज़, एलेनाइन अमाइनोट्रांसफरेज़) के सीरम स्तरों में भी प्लेसिबो समूह की तुलना में उल्लेखनीय कमी हुई। कर्क्युमिन सुरक्षित और सुसह्य था। NAFLD वाले रोगियों में किए गए एक दूसरे अध्ययन ने पुष्टि की कि कर्क्युमिन ने सीरम लिपिड और यकृत एंज़ाइमों में कमी की।

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