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अपने माइटोकॉंड्रिया को चार्ज करके अपने स्वास्थ्य को बदलें

12 अगस्त 2019

एरिक मैड्रिड एमडी द्वारा

इस लेख में:

माइटोकॉंड्रिया एक तरह से सभी जीवों के “पॉवरहाउस” हैं। वे कोशिकाओं के भीतर स्थित “कोशिकाएं” हैं, और उनके बिना हम सबकी मिनट-दर-मिनट काम करने के लिए आवश्यक ऊर्जा खत्म हो जाएगी। माइटोकॉंड्रिया लाल रक्त कोशिकाओं के सिवाय शरीर की हर कोशिकाओं में पाए जाते हैं — औसत कोशिका की दीवार के भीतर लगभग 1,000 ऊर्जा-उत्पादक माइटोकॉंड्रिया होते हैं, जबकि हृदय की मांसपेशी की कोशिकाओं में उनकी संख्या 5,000 तक होती है। 

स्वस्थ कार्यशील माइटोकॉंड्रिया होना आपके मोबाइल फोन में पूरी चार्ज की हुई बैटरी के होने के समान है। ठीक जैसे आप बैटरी के कम होने और रिचार्ज करने की क्षमता न होने पर अपने मोबाइल फोन के उपयोग को न्यूनतम कर देते हैं, ठीक वैसे ही, क्षमता के कम होने पर आपका शरीर भी ऊर्जा के उपयोग को कम करता है जिससे आपको मांसपेशियों में दर्द और थकान महसूस होने लगती है। 

माइटोकॉंड्रिया से संबंधित विज्ञान

माइटोकॉंड्रिया का मुख्य उद्देश्य हमारी सांस में ली जाने वाली ऑक्सीजन के साथ ग्लुकोज या वसा अम्लों को लेकर उन्हें ऊर्जा में बदलना है। इस काम को पूरा करने लिए पर्याप्त मात्रा में विटामिन, खनिज, और अन्य पोषक तत्व आवश्यक होते हैं जिनकी चर्चा हम नीचे करेंगे। ऊर्जा का उत्पाद दिन के हर पल होता है, चाहे हम जाग रहे हों या नींद में हों। 

ग्राम प्रति ग्राम की दृष्टि से, माइटोकॉंड्रिया सूर्य से अधिक ऊर्जा का उत्पादन करते हैं, जिसके कारण वे संपूर्ण जगत में सबसे शक्तिशाली ऊर्जा उत्पादक संरचनाएं हैं। ग्लुकोज या वसा अम्लों में जैवरसायनिक परिवर्तन होने के बाद, माइटोकॉंड्रिया इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला (ETC) नामक एक व्यापक प्रणाली में से अपने इलेक्ट्रॉनों को ले जाते हैं। यह वह जगह है जहाँ जादू होता है — कसरत और उपवास के दौरान नए माइटोकॉंड्रिया बनते हैं, और इसी वजह से इन गतिविधियों के दौरान समग्र ऊर्जा स्तरों में अक्सर वृद्धि होती है। 

शरीर की 70 प्रतिशत ऊर्जा की खपत मस्तिष्क में होती है, तथा शेष ऊर्जा का उपभोग हृदय, गुर्दे, यकृत, और आँखें करती हैं। इससे पता चलता है कि माइटोकॉंड्रिया की दुष्क्रिया का संबंध निम्नलिखित अवस्थाओं के साथ क्यों देखा जाता है: 

  • उम्र के बढ़ने के साथ कम सुनाई देना
  • दीर्घकालिक थकान (ऊर्जा की कमी)
  • कंजेस्टिव हार्ट फेल्यूर
  • अवसाद 
  • फाइब्रोमायल्जिया (मांसपेशियों में पीड़ा और दर्द)
  • ग्लूकोमा
  • बच्चे पैदा करने की क्षमता का अभाव (शुक्राणु माइटोकॉंड्रिया से अपनी ऊर्जा प्राप्त करते हैं)
  • मैक्युलर डीजनरेशन 
  • याददाश्त का कम हो जाना
  • माइग्रेन के सिरदर्द
  • समय-पूर्व बुढ़ापा 

कुछ विशिष्ट जीवनशैलियाँ माइटोकॉंड्रिया की कारगरता को कम कर सकती हैं। इष्टतम रूप से काम करने वाले माइटोकॉंड्रिया पाने के लिए, संतुलित जीवन की जरूरत पड़ सकती है। नींद को पर्याप्त, और आहार को सुगठित तथा विविध प्रकार के फलों और सब्ज़ियों से युक्त होना चाहिए ताकि हर प्रकार के विटामिन, खनिज, और फाइटोन्यूट्रिएंट प्राप्त हो सकें। इसके अलावा, उचित ढंग से संतुलित आंतरिक तंत्रिका प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए दैनंदिन तनाव को पर्याप्त रूप से प्रबंधित करना जरूरी होता है। 

क्या आपको पूरकों पर विचार करना चाहिए?

सर्वोत्तम इरादों और प्रयासों के बावजूद, सुसंतुलित आहार का सेवन करना और तनाव को कम करना आसान नहीं है। व्यक्ति की विशिष्ट परिस्थितियों पर निर्भर करते हुए, अतिरिक्त अनुपूरण पर विचार किया जा सकता है, खास तौर पर यदि दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं मौजूद हों। उदाहरण के लिए, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, कैंसर और पाचन-संबंधी रोग कतिपय पोषक तत्वों की चयापचय संबंधी जरूरतों को बढ़ा सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि, नियमित रूप से व्यायाम करने वाले लोगों को पसीने के माध्यम से पोषक तत्वों का अत्यधिक नुकसान होने के कारण सामान्य से कम पोषक तत्व स्तरों के होने का जोखिम हो सकता है। इसके फलस्वरूप औसत से अधिक पोषक तत्वों का सेवन करने की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा, उम्र के बढ़ने के साथ-साथ हमारी आंतों की पोषक तत्वों को अवशोषित करने की क्षमता नाटकीय रूप से कम हो जाती है। 

कई दवाईयाँ जैसे कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली औषधियाँ (एटॉर्वास्टैटिन, सिम्वास्टैटिन, आदि), बीटा-ब्लॉकर्स (एटीनोलॉल, कार्विडिलॉल, मेटोप्रोलॉल, आदि), एसिड रेड्यूसर्स, या डाइयूरेटिक्स नीचे सूचीबद्ध कई पूरकों के उत्पादन और अवशोषण में हस्तक्षेप कर सकते हैं या उनके उत्सर्जन को बढ़ा सकते हैं। 

माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य और ऊर्जा उत्पादन को इष्टतम करने के लिए पूरक

कोएंज़ाइम क्यू10 

कोक्यू10 की जरूरत शरीर की हर कोशिका के उचित ढंग से काम करने के लिए पड़ती है। उम्र के बढ़ने के साथ कोएंज़ाइम-क्यू10 का उत्पादन आम तौर पर कम होने लगता है जिससे 40 के दशक के आरंभ में इसके स्तर कम होने लगते है। साथ ही, बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल या डायबिटीज़ के लिए स्टैटिन दवाईयाँ लेने वाले लोगों में भी कोएंज़ाइम क्यू10 के स्तरों के कम होने की संभावना होती है। अनुशंसित खुराक: 50 से 300 मिग्रा प्रति दिन।

एल-कार्निटीन 

यह महत्वपूर्ण अमीनो अम्ल ऊर्जा के उत्पादन के लिए आवश्यक है। इसका प्राथमिक काम मुक्त वसा अम्लों को माइटोकॉंड्रिया में ले जाने में मदद करना है, जहाँ उनका उपयोग ऊर्जा के लिए किया जा सकता है। ऐसा मुक्त वसा अम्लों के बीटा-रूपांतरण नामक एक प्रक्रिया से गुजरने के बाद होता है। 

एल-कार्निटीन को बनाया या कतिपय खाद्य पदार्थों के खाने पर ग्रहण किया जा सकता है। शाकाहारियों और वृद्ध लोगों में क्रमशः सर्वाहारियों और युवा लोगों की अपेक्षा इसके स्तर कम होते हैं। साथ ही विशिष्ट अपस्मार दवाईयाँ (वैलप्रोइक एसिड, फेनोबार्बिटाल, फेनिटॉइन,या कार्बामाज़ेपाइन) लेने वाले लोगों में एल-कार्निटीन स्तर कम होते हैं। 

2002 में किए गए एक अध्ययन ने दर्शाया कि चूहों को एल-कार्निटीन (और अल्फा लिपोइक एसिड) खिलाने से, उनकी माइटोकॉंड्रिया गतिविधि में सुधार और जारणकारी तनाव कम होता है। 2002 में हुए एक और अध्ययन में हृदय के समग्र स्वास्थ्य में एल-कार्निटीन के लाभ पर चर्चा की गई। अनुशंसित खुराक: 500 से 3,000 मिग्रा प्रति दिन। 

पीक्यूक्यू (पाइरोलोक्विनोलीन क्विनोन) 

पीक्यूक्यू माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य का समर्थन करने में मदद करता है। 2010 में Journal of Biological Chemistry में प्रकाशित एक अध्ययन ने दर्शाया कि यह महत्वपूर्ण पूरक कोशिकाओं में नए माइटोकॉंड्रिया के निर्माण में सहायक हो सकता है, एक प्रक्रिया जिसे वैज्ञानिक बायोजेनेसिस कहते हैं। इससे शरीर को, मोटे तौर पर कहें तो, “अधिक ऊर्जावान” बनने की क्षमता मिलती है। इसके अलावा, पीक्यूक्यू माइटोकॉंड्रिया की जारणकारी क्षति से बचने में मदद करता है, जैसा कि डॉ. ली नो ने अपनी पुस्तक, Mitochondria and the Future of Medicine में समझाया है

2013 में The Journal of Nutritional Biochemistry में प्रकाशित एक अध्ययन ने दर्शाया कि पीक्यूक्यू शरीर में शोथ को कम करने में मदद कर सकता है। इस बात का प्रमाण था अन्य परिवर्तनों के अलावा सीआरपी (सी-रिएक्टिव प्रोटीन) और आईएल-6 (इंटरल्यूकिन-6) के स्तरों में कमी जिससे माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य में सुधार का संकेत मिलता है। यह भी माना जाता है कि यह मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करता है और वृद्ध होने की गति को कम करता है। डार्क चॉकलेट पीक्यूक्यू का अच्छा स्रोत है। पूरक की सुझाई गई खुराक: 10 से 40 मिग्रा प्रति दिन। 

डी-राइबोज़

धावकों को शारीरिक गतिविधि से पहले और बाद इस महत्वपूर्ण शर्करा की खुराक लेने पर विचार करना चाहिए। हालांकि डी-राइबोज़ का संबंध एक शर्करा अणु से है, राइबोज़ की बड़ी खुराकें डायबिटीज़ से ग्रस्त लोगों के लिए सुरक्षित हैं और रक्त शर्करा स्तरों को प्रभावित नहीं करती हैं। डी-राइबोज़ ऊर्जा का निर्माण करने में माइटोकॉंड्रिया की मदद कर सकता है, जैसा कि 2008 में Journal of Dietary Supplements में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है। कम से कम रूप से, 500 मिग्रा प्रति दिन सुरक्षित रूप से लिया जा सकता है। तथापि, कुछ लोग इष्टतम ऊर्जा के लिए 3 से 5 ग्राम के बीच प्रति दिन लेते हैं। 

विटामिन सी

विटामिन सी, जिसे एस्कॉर्बिक एसिड या एस्कॉर्बेट भी कहते हैं, पिछले 50 वर्षों में सर्वाधिक शोध किए गए विटामिनों में से एक है। वैज्ञानिक साहित्य की एक खोज प्रकट करती है कि 1968 से विटामिन सी पर 53,000 से अधिक अध्ययन किए गए हैं। ये निष्कर्ष दर्शाते हैं कि यह मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली और हृदयवाहिकीय, मस्तिष्क, और त्वचा के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने सहित कई लाभ प्रदान करने में मदद करता है। 

2009 में American Journal of Clinical Nutrition में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, रक्त की जाँच करने पर पता चला कि छह और उससे अधिक उम्र के सत्तर प्रतिशत से अधिक लोगों में विटामिन सी की कमी थी। सर्वेक्षण में भाग लेने वाले आधे से अधिक लोग विटामिन सी से प्रचुर खाद्य पदार्थों का सेवन कम मात्रा में करते थे। 

विटामिन सी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडैंट है, जो यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि माइटोकॉंड्रिया उचित ढंग से काम कर रहे हैं। शरीर में एल-कार्निटीन का निर्माण करने के लिए इसके पर्याप्त स्तरों की जरूरत होती है। अनुशंसित खुराक: विटामिन सी कैप्सूल/गोलियाँ – 250 मिग्रा से 2,000 मिग्रा प्रति दिन, विटामिन सी पाउडर- 250 मिग्रा से 2,000 मिग्रा प्रति दिन या विटामिन सी गमीज़ - 250 मिग्रा से 2,000 मिग्रा प्रति दिन

बी विटामिन और माइटोकॉंड्रिया का स्वास्थ्य

राइबोफ्लेविन (विटामिन बी2) 

राइबोफ्लेविन माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। राइबोफ्लेविन एफएमएन और एफएडी जैसे महत्वपूर्ण माइटोकॉंड्रियल एंज़ाइमों के लिए आवश्यक है। इन “कोफैक्टर्स” की जरूरत माइटोकॉंड्रिया में ऊर्जा अणु एटीपी का निर्माण करने के लिए पड़ती है। 

राइबोफ्लेविन प्रोटीन, वसाओं और कार्बोहाइड्रेट के पर्याप्त पाचन के लिए आवश्यक है। राइबोफ्लेविन अमीनो अम्ल ट्रिप्टोफैन को विटामिन बी3 (नियासिन) में बदलने में मदद करता है, जिससे विटामिन बी-6 को सक्रिय करने में मदद मिलती है। यकृत के रोग, शराब की लत, गुर्दे के रोग, और दीर्घकालिक दस्त से ग्रस्त लोगों को राइबोफ्लेविन की कमी होने का जोखिम होता है, जैसा कि 2019 में Journal of Inherited Metabolic Diseases में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया था।

विटामिन बी3 (नियासिन)

विटामिन बी3 दो भिन्न प्रारूपों में पाया जा सकता है—पहला है नियासिन (जिसे निकोटिनिक एसिड भी कहते हैं), और दूसरा है नियासिनामाइड (जिसे निकोटिनामाइड भी कहते हैं)। दोनों प्रारूप निकोटिनामाइड एडीनीन डाईन्यूक्लियोटाइड (एनएडी) के पूर्ववर्ती हैं, जो माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

नियासिन प्राथमिक रूप से ऊर्जा चयापचय में मदद करने वाली 400 से अधिक जैवरसायनिक प्रक्रियाओं में एक कोफैक्टर के रूप में शामिल होता है। नियासिन भोजन को ऊर्जा में बदलने और डीएनए की मरम्मत में मदद करता है। 

यदि इसकी कमी हो जाती है, तो हम कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, या वसाओं का विघटन नहीं कर पाते हैं। शरीर द्वारा नियासिन को एनएडी में परिवर्तित किया जाता है, जो एक सक्रिय अणु है जो मानव शरीर को पूर्वनिश्चित ढंग से काम करने में मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

विटामिन बी5 (पैंटोथेनिक एसिड)

यह विटामिन जल में घुलनशील है और कोएंज़ाइम ए के संश्लेषण के लिए आवश्यक एक अनिवार्य पोषक तत्व है। इसकी जरूरत वसाओं, कार्बोहाइड्रेट, और प्रोटीन के चयापचय के लिए भी पड़ती है। वसा अम्लों की माइटोकॉंड्रिया में प्रवेश करने में मदद के लिए इसकी मौजूदगी आवश्यक है। 1996 के एक अध्ययन ने दर्शाया कि विटामिन बी5 माइटोकॉंड्रिया को जारणकारी क्षति से बचाने में मदद कर सकता है।

विटामिन बी6 (पिरिडॉक्सीन)

विटामिन B6 के असंख्य स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं जिनमें डायबिटिक जटिलताओं की रोकथाम से लेकर बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करना और हृदय रोग की रोकथाम शामिल है। 1981 में पशुओं का उपयोग करके किए गए एक अध्ययन के अनुसार, 20 प्रतिशत तक विटामिन बी6 माइटोकॉंड्रिया में पाया जाता है, इसलिए माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य में इसके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता है। 2006 के एक अध्ययन ने यह भी दर्शाया कि एंटीऑक्सीडैंट्स के माइटोकॉंड्रिया द्वारा उत्पादन करने में विटामिन बी6 महत्वपूर्ण है, जो उनकी सुरक्षा करता है।

आयरन

आयरन हमारे शरीर के सबसे आम खनिजों में से एक है। यह हीमोग्लोबिन के उत्पादन के लिए आवश्यक है, जो सारे शरीर में ऑक्सीजन का परिवहन करने वाले रक्त का मुख्य प्रोटीन है। यदि किसी व्यक्ति को आयरन की कमी होती है, तो वह लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करने में असमर्थ होता है, जिसके कारण एनीमिया (रक्ताल्पता) नामक एक रोग हो सकता है जिससे थकान पैदा हो सकती है। इसकी कमी होने पर, डॉक्टर के लिए इसका कारण निर्धारित करना महत्वपूर्ण होता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार आयरन की कमी सारे विश्व में सबसे आम पोषण संबंधी विकारों में से एक है। अनुमानित है कि विश्व भर में 50% एनीमिया का कारण आयरन की कमी है। माहवारी के फलस्वरूप, स्त्रियों में आयरन की कमी पुरुषों की अपेक्षा अधिक आम होती है।

हाल के वर्षों में, यह ज्ञात हुआ है कि आयरन माइटोकॉंड्रिया के स्वास्थ्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। माइटोकॉंड्रिया के कई एंज़ाइम्स के समुचित ढंग से कार्य करने के लिए आयरन खनिज की जरूरत पड़ती है, जिससे एक और प्रक्रिया समझ में आती है जिसके जरिए आयरन की कमी थकान में, एनीमिया से स्वतंत्र, योगदान कर सकती है। डॉक्टर अक्सर फेरिटिन नामक एक रक्त जाँच करते हैं, जिसके कम होने पर संकेत मिल सकता है कि आयरन की कमी वास्तव में कितनी है। इसके इष्टतम स्तर, एनीमिया के न होने पर भी, 50 नैनोग्राम/मिली हैं। जब आयरन को विटामिन सी पूरक के साथ लिया जाता है, तब अवशोषण इष्टतम हो जाता है। 

संदर्भ:

  1. Hagen TM, Liu J, Lykkesfeldt J, et al. Feeding acetyl-L-carnitine and lipoic acid to old rats significantly improves metabolic function while decreasing oxidative stress [published correction appears in Proc Natl Acad Sci U S A 2002 May 14;99(10):7184]. Proc Natl Acad Sci U S A. 2002;99(4):1870–1875. doi:10.1073/pnas.261708898
  2. Ann N Y Acad Sci. 2002 Apr;959:491-507. (L-carnitine and heart health)
  3. J Nutr Biochem. 2013 Dec;24(12):2076-84. doi: 10.1016/j.jnutbio.2013.07.008.
  4. Proc Natl Acad Sci U S A. 2018 Oct 23;115(43):10836-10844. doi: 10.1073/pnas.1809045115. Epub 2018 Oct 15.
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  7. Balasubramaniam S, Christodoulou J, Rahman S. Disorders of riboflavin metabolism. J. Inherit. Metab. Dis. 2019 Jan 24;
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  10. J Biol Chem. 1981 Jun 25;256(12):6041-6.

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