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पोषण

प्रसव-पश्चात् अवसाद के लिए प्राकृतिक उपाय

12 जून 2019

लेखिका: चेरिलिन सेकचिनी, एमडी

प्रसव-पश्चात् अवसाद मनोदशा का एक विकार है जो बच्चे के जन्म के बाद माता की स्वयं की या अपने बच्चे की देखभाल करने की क्षमता में हस्तक्षेप कर सकता है। यह बेबी ब्लूज़ से अलग है, जो कि आम तौर पर प्रसव के पहले दो या तीन दिनों में शुरू होता है और दो सप्ताह तक बना रह सकता है। जब अवसाद इस समय-बिंदु से परे जारी रहता है, तो उसे प्रसव-पश्चात् अवसाद के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। प्रसव-पश्चात् अवधि में स्त्री के मनोरोग अवस्था के विकसित होने की सर्वाधिक संभावना होती है, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि इसके लक्षण गर्भावस्था के दौरान या जन्म के बाद एक वर्ष तक शुरू हो सकते हैं।

प्रसव-पश्चात् अवसाद के संकेत और लक्षण

प्रसव-पश्चात् अवसाद के कुछ संकेतों और लक्षणों में शामिल हैं, अवसादित मनोदशा, शिशु के साथ संपर्क बनाने में कठिनाई, मित्रों और परिवार से उखड़ापन, भूख न लगना, सोने में असमर्थता या बहुत ज्यादा सोना, ऊर्जा का ह्रास, आनंददायक गतिविधियों से प्रसन्न होने में कठिनाई, अच्छी माँ बनने के बारे में भय या लाचारी की अनुभूति।

किसी लाइसेंसप्राप्त चिकित्सक से मिलने, साइकोथेरेपी करवाने और संभावित रूप से नुस्खे की दवाईयों का उपयोग करने के अलावा, माताएं अपने प्रसव-पश्चात् अवसाद के उपचार की योजना के हिस्से के रूप में स्वस्थ जीवनशैली चुनाव करने और प्राकृतिक उपचारों का उपयोग करने का चुनाव भी कर सकती हैं। ऐसे कई प्राकृतिक उत्पाद उपलब्ध हैं जो प्रसव पश्चात् अवसाद से जूझ रही माताओं के लिए शानदार अनुपूरक उपचार हैं।

उपलब्ध अनुसंधान सुझाव देता है कि प्रसव-पश्चात् अवसाद से संबद्ध कुछ लक्षणों का उपचार करने में अरोमाथेरेपी मददगार हो सकती है। खास तौर पर, लैवेंडर का इत्र बेचैनी के स्तरों को कम करते हुए सोने के पैटर्नों में सुधार कर सकता है और तंदुरुस्ती की अनुभूतियों में वृद्धि कर सकता है। प्रसव-पश्चात् अवसाद के लक्षणों को नियंत्रित करने में मालिश एक और उपयोगी, प्राकृतिक साधन साबित हो सकता है। इस तकनीक का उपयोग करके खुद को परिपोषित करने और तनाव दूर करने में समय लगाना बच्चे के जन्म के बाद खुद की बढ़िया देखभाल करने का शानदार तरीका है। मालिश का उपयोग अक्सर अरोमाथेरेपी के साथ संयोजन में किया जाता है।

प्रसव-पश्चात् अवसाद के लिए अनुपूरण

विटामिन डी और ओमेगा-3

इसके अलावा, विटामिन डी अनुपूरण और ओमेगा-3 आहार पूरकों को अवसाद पर लाभदायक प्रभाव डालते हुए दर्शाया गया है। कुछ अध्ययनों ने दर्शाया गया है कि माताओं के स्तन के दूध में डोकोसाहेक्सेनोइक एसिड  नामक एक विशिष्ट ओमेगा-3 पॉलीअनसैचुरेटेड वसा अम्ल के उच्च स्तर प्रसव-पश्चात् अवसाद की दरों में कमी से संबद्ध हैं। हालांकि प्रसव-पश्चात् अवसाद में विटामिन डी की भूमिका अस्पष्ट बनी हुई है, उनके बीच संबंध स्थापित किया गया है और विटामिन डी के स्तरों को अनुपूरित करना सुरक्षात्मक लगता है।

रिबोफ्लेविन

रिबोफ्लेविन, या विटामिन बी-2, भी प्रसव-पश्चात् अवसाद के विकसित होने के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। इसे मनोदशा के विकार पर सकारात्मक प्रभाव डालते दर्शाया गया है और इसका मध्यम मात्रा में उपभोग लक्षणों को कम कर सकता है।

प्रसव-पश्चात् अवसाद के प्रति प्राकृतिक उपाय

उज्ज्वल प्रकाश से उपचार एक और उपयोगी साधन है जिसका प्रसवपूर्व और प्रसव-पश्चात् अवसाद में अध्ययन किया गया है। हालांकि प्रसव-पश्चात् आबादी में नमूने के छोटे आकार के कारण निष्कर्ष सीमित हैं, मौसमी और गैर-मौसमी अवसाद के लिए इसकी प्रभावकारिता को ध्यान में रखते हुए, यह उपचार मनोदशा के लिए सकारात्मक प्रभाव दर्शा सकता है। प्रतिदिन 30-60 मिनट तक रोशनी के संपर्क में बैठने की अनुशंसा की जाती है।

व्यायाम मनोदशा को सुधारने और प्रसव-पश्चात् अवसाद के लक्षणों को कम करने का एक और बढ़िया तरीका है। मध्यम शारीरिक गतिविधि को ऊर्जा में वृद्धि और मनोदशा में सुधार करते दर्शाया गया है। कतिपय व्यायाम कक्षाएं एक नई माँ के रूप में आपकी व्यस्त दिनचर्या में कसरत को फिट करने के साथ-साथ शिशु के साथ आपके बंधन को मजबूत करने के लिए शिशु को साथ लाने के लिए आपको प्रोत्साहित करती हैं। स्ट्रोलर में शिशु के साथ लंबी दूर तक चलना या शिशु को कैरियर में रखकर थोड़ी दूर तक चलना कुछ व्यायाम संभव करने के दो अन्य तरीके हैं।

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